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शनिवार, 20 सितंबर 2008

ज़माना

न कोई दोस्त है मेरा नही कोई भी साथी है
सोचती हूँ पीठ पर ये ज़ख्म कैसे हो गए ?

बहुत कहते थे वो ख़ुद को मेरा हित चाहने वाले
घर उजड़ते ही मेरा बेदर्द कैसे हो गए ?

ये दुनिए क्या है ये जानो कि ये केवल तमाशा है
जो कल तक थे इधर ऐ दिल वो अब उस पार कैसे हो गए?

पंहुचाया मुकद्दर ने जो शोहरत कि बुलंदी पर
जो कल थे घात मे बठे हमारे यार कैसे हो गए ?

बदलते इस ज़माने ने ज़रा हमको भी बदला है
नहीं कुछ बोलते थे हम कभी बेबाक कैसे हो गए ?


10 टिप्‍पणियां:

Roopesh Singhare ने कहा…

behad khoobsurat evam sanjeeda bhaav...Shubhkaamnaayen..!!

anshuja ने कहा…

padhne ke liye shukriya

anshu ने कहा…

bahut he umda likha hain aapne
hie i m himanshu n i found ur writing very creative n it seems ki aap ki hindi literature mein bahut pakar hain congratulatons for u

Pradeep Kumar ने कहा…

न कोई दोस्त है मेरा नही कोई भी साथी है
सोचती हूँ पीठ पर ये ज़ख्म कैसे हो गए ?

wah ! kya baat hai !!
sahee hai aakhir zakhm bhi to apne hi dete hain .
blog jagat main swaagat !

ajay ने कहा…

wanna be my friend? i ajay from Lucknow(09839360607)

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

sahi hai mitr, nahit sahi gazal hai .. zindagi ki sacchai ko dikhaate hue aapne bahut acche shaabdo me apni baat kah di hai ... badhai ...

aabhar

vijay

pls read my new poem "झील" on my poem blog " http://poemsofvijay.blogspot.com

Md Shadab ने कहा…

bahut badiya didi but i think u should increase ur posts.check my bog www.mdshadab.blogspot.com

kajal ने कहा…

behad lajawab .mast ........aati uttam..kya khne........wah wah

Hrishi ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Hrishi ने कहा…

"न कोई दोस्त है मेरा नही कोई भी साथी है
सोचती हूँ पीठ पर ये ज़ख्म कैसे हो गए ?"

Tarif kya krna jise jag ne saraha hai
yah to jaise suraj ko dipak dikhaya hai...

Uttam...