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रविवार, 7 दिसंबर 2008

हम नहीं समझते

कौन समझता है हमको जहाँ मे यारों।
औरों की क्या कहें, हम खुद नहीं समझते।

कैसे हैं हम, कहाँ हैं, क्या आरजू हमारी।
ये कैसी कशमकश है, हम खुद नहीं समझते।

फैली घुटन हवा मे, और सांस ले रहे है।
मजबूरियाँ हमारी, हम खुद नहीं समझते।

क्या मंजिलें हमारी, और रास्ते किधर हैं।
रोशनी है काफी, पर हम नहीं समझते।

मज़हब का नाम लेकर, कर देना कत्ल सबको।
दोपाय का जुनूं ये, हम कुछ नहीं समझते।

फैलाया विष जिन्होंने, वे पहन उजले कपडे।
बन हुक्मरान बैठे,हम ये नहीं समझते।

कहते हैं लोग सारे, तुम बोलती बहुत हो।
चुप रहके दर्द सहना, ये हम नहीं समझते।





7 टिप्‍पणियां:

anshu ने कहा…

kya baat hain........

''अम्बरीष मिश्रा '' ने कहा…

kya aap ka andaaz hai kya baat hai aap se anurodh karnga ki aap kee rachna hai koi yadee to aap hame jarur de hamaree manch par aap sab ka swagaat hai

Rahul ने कहा…

I dont kno about the tone of the poem, but I'd only like to add:
"Iltaza yahi hai, inteha yahi hai,
hum samjhte hain sab, par jaise jaante nahin hain."

Rahul ने कहा…

Check this link:
http://www.orkut.co.in/Main#Community.aspx?rl=cpn&cmm=48876402
Probably your taste!!!

Dr. shyam gupta ने कहा…

chup rahake dard sahnaa ,ham ye nahee samajhte.
----bahut khoob ,ansujaa,

kajal ने कहा…

mast hai yaar ....lajawab........kya kahne...

संजय भास्कर ने कहा…

... बेहद प्रभावशाली अभिव्यक्ति है ।